Showing posts with label positive thinking. Show all posts
Showing posts with label positive thinking. Show all posts
जितना बड़ा "प्लाट" होता है उतना बडा "बंगला" नही होता
जितना बड़ा "बंगला" होता है उतना बड़ा "दरवाजा" नही होता
जितना बड़ा "दरवाजा" होता है उतना बड़ा "ताला" नही होता
जितना बड़ा "ताला" होता है उतनी बड़ी "चाबी" नही होती ।
परन्तु "चाबी" का पूरे बंगले पर अधिकार होता है।


इसी तरह मानव के जीवन मे बंधन और मुक्ति का आधार मन की चाबी पर ही निर्भर होता है।
पैसे के अभाव मे जगत 1% दुखी है
परन्तु
समझ के अभाव मे जगत 99% दुखी है।
"सदा खुश रहिए और मस्त रहिए"
🌻भगत के वश में हैं भगवान🌻

🌷एक गांव में एक पंडित जी भागवत कथा सुनाने आए। पूरे सप्ताह कथा वाचन चला। पूर्णाहुति पर दान दक्षिणा की सामग्री इक्ट्ठा कर घोडे पर बैठकर पंडितजी रवाना होने लगे। गांव के धन्ना जाट ने उनके पांव पकड लिए। 

वह बोला- पंडितजी महाराज ! आपने कहा था कि जो ठाकुरजी की सेवा करता है उसका बेडा पार हो जाता है। आप तो जा रहे है। मेरे पास न तो ठाकुरजी है, न ही मैं उनकी सेवापूजा की विधि जानता हूं। इसलिए आप मुझे ठाकुरजी देकर पधारें। 

पंडित जी ने कहा- चौधरी, तुम्हीं ले आना। धन्ना जाट ने कहा - मैंने तो कभी ठाकुर जी देखे नहीं, लाऊंगा कैसे ? पंडित जी को घर जाने की जल्दी थी। उन्होंने पिण्ड छुडाने को अपना भंग घोटने का सिलबट्टा उसे दिय और बोले - ये ठाकुरजी है। इनकी सेवापूजा करना। 

धन्ना जाट ने कहा - महाराज में सेवापूजा का तरीका भी नहीं जानता। आप ही बताएं। पंडित जी ने कहा - पहले खुद नहाना फिर ठाकुर जी को नहलाना। इन्हें भोग चढाकर फिर खाना। इतना कहकर पंडित जी ने घोडे के एड लगाई व चल दिए। 

धन्ना सीधा एवं सरल आदमी था। पंडितजी के कहे अनुसार सिलबट्टे को बतौर ठाकुरजी अपने घर में स्थापित कर दिया। दूसरे दिन स्वयं स्नानकर सिलबट्टे रूप ठाकुरजी को नहलाया। 
विधवा मां का बेटा था। खेती भी ज्यादा नहीं थी। इसलिए भोग मैं अपने हिस्से का बाजरी का टिक्कड एवं मिर्च की चटनी रख दी। ठाकुरजी से धन्ना ने कहा-पहले आप भोग लगाओ फिर मैं खाऊंगा। 

जब ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया तो बोला-पंडित जी तो धनवान थे। खीर-पूडी एवं मोहन भोग लगाते थे। मैं तो जाट का बेटा हूं, इसलिए मेरी रोटी चटनी का भोग आप कैसे लगाएंगे ? पर साफ-साफ सुन लो मेरे पास तो यही भोग है। खीर पूडी मेरे बस की नहीं है। 

ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया तो धन्ना भी छह दिन भुखा रहा। इसी तरह वह रोज का एक बाजरे का ताजा टिक्कड एवं मिर्च की चटनी रख देता एवं भोग लगाने की अरजी करता। ठाकुरजी तो पसीज ही नहीं रहे थे। छठे दिन बोला-ठाकुरजी, चटनी रोटी खाते क्यों शर्माते हो ? आप कहो तो मैं आंखें मूंद लू फिर खा लो। ठाकुरजी ने फिर भी भोग नहीं लगाया तो नहीं लगाया। 

धन्ना भी भूखा प्यासा था। सातवें दिन धन्ना जट बुद्धि पर उतर आया। फूट-फूट कर रोने लगा एवं कहने लगा कि सुना था आप दीन-दयालु हो, पर आप भी गरीब की कहां सुनते हो, मेरा रखा यह टिककड एवं चटनी आकर नहीं खाते हो तो मत खाओ। अब मुझे भी नहीं जीना है, इतना कह उसने सिलबट्टा उठाया और सिर फोडने को तैयार हुआ, अचानक सिलबट्टे से एक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ एवं धन्ना का हाथ पकड कहा- देख धन्ना मैं तेरा चटनी टिकडा खा रहा हूं। 

ठाकुरजी बाजरे का टिक्कड एवं मिर्च की चटनी मजे से खा रहे थे। जब आधा टिक्कड खा लिया तो धन्ना बोला-क्या ठाकुरजी मेरा पूरा टिक्कड खा जाओगे ? मैं भी छह दिन से भूखा प्यासा हूं। आधा टिक्कड तो मेरे लिए भी रखो। 

ठाकुरजी ने कहा - तुम्हारी चटनी रोटी बडी मीठी लग रही है तू दूसरी खा लेना। धन्ना ने कहा - प्रभु ! मां मुझे एक ही रोटी देती है। यदि मैं दूसरी लूंगा तो मां भूखी रह जाएगी। प्रभु ने कहा-फिर ज्यादा क्यों नहीं बनाता। धन्ना ने कहा - खेत छोटा सा है और मैं अकेला। 

ठाकुरजी ने कहा - नौकर रख ले। धन्ना बोला-प्रभु, मेरे पास बैल थोडे ही हैं मैं तो खुद जुतता हूं। ठाकुरजी ने कहा-और खेत जोत ले। धन्ना ने कहा-प्रभु, आप तो मेरी मजाक उडा रहे हो। नौकर रखने की हैसियत हो तो दो वक्त रोटी ही न खा लें मां-बेटे। 

इस पर ठाकुरजी ने कहा - चिन्ता मत कर मैं तेरी मदद करूंगा। कहते है तबसे ठाकुरजी ने धन्ना का साथी बनकर उसकी मदद करनी शुरू की। धन्ना के साथ खेत में कामकाज कर उसे अच्छी जमीन एवं बैलों की जोडी दिलवा दी। कुछे अर्से बाद घर में भैंस भी आ गई। मकान भी पक्का बन गया। 

सवारी के लिए घोडा आ गया। धन्ना एक अच्छा खासा जमींदार बन गया। कई साल बाद पंडितजी पुनः धन्ना के गांव भागवत कथा करने आए। धन्ना भी उनके दर्शन को गया। प्रणाम कर बोला-पंडितजी, आप जो ठाकुरजी देकर गए थे वे छह दिन तो भूखे प्यासे रहे एवं मुझे भी भूखा प्यासा रखा। 
सातवें दिन उन्होंने भूख के मारे परेशान होकर मुझ गरीब की रोटी खा ही ली। उनकी इतनी कृपा है कि खेत में मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर काम में मदद करते है। अब तो घर में भैंस भी है। आपको सात दिन का घी-दूध का ‘सीधा‘ यानी बंदी का घी-दूध मैं ही भेजूंगा। पंडितजी ने सोचा मूर्ख आदमी है। मैं तो भांग घोटने का सिलबट्टा देकर गया था। 

गांव में पूछने पर लोगों ने बताया कि चमत्कार तो हुआ है। धन्ना अब वह गरीब नहीं रहा। जमींदार बन गया है। दूसरे दिन पंडितजी ने कहा-कल कथा में तेरे खेत में काम वाले साथी को साथ लाना। घर आकर प्रभु से निवेदन किया कि कथा में चलो तो प्रभु ने कहा - मैं नहीं चलता तुम जाओ। 

धन्ना बोला - तब क्या उन पंडितजी को आपसे मिलाने घर ले आऊ। प्रभु ने कहा - हरगिज नहीं। मैं झूठी कथा कहने वालों से नहीं मिलता। जो अपना काम मेरी पूजा समझ करता है मैं उसी के साथ रहता हूं।
🌻बदल सकता है घर के ग्रह दोष🌻

1. प्रभु ने आपके भाग्य में जो लिख दिया है उसे कोई टाल नहीं सकता, मगर ईर्ष्या रूपी रोग आपके सुखों को भगा कर ले जाता है।

2. जीने की कला संत-महापुरुष सिखाते हैं। जैसी आपकी खुराक होगी-वैसा शरीर। जैसा मन  वैसे विचार होंगे।

3. जीवन की आधारशिला रसोई है। रसोई ही मंदिर है।


4. परिवार का पालन-पोषण करना भी यज्ञ है। हवन यज्ञ करने, परिवार का पालन-पोषण करने से भी आनंद प्राप्त होता है।

5. जिन बेटियों को कोख में खत्म कर दिया जाता है वे जन्म लेकर आपके घर के ग्रह दोष बदल सकती हैं। ग्रंथों में भी बेटियों को लक्ष्मी का दर्जा दिया है।

6. अपनी मां को खुश कर लो। तुम्हारे हाथों की लकीरें बदल जाएंगी और गम की जंजीरें टूट जाएंगी। तुम खुशहाल हो जाओगे। मां ही भगवान का दूसरा रूप है।


7. प्रभु श्री राम सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं और सब नाच रहे हैं। हम सबकी डोर उस परमपिता के हाथों में है।
इस धरती के सबसे पहले ज्योतिर्लिंग की महिमा

देश में शिव के जो बारह ज्योतिर्लिंग है उनके बारे में मान्यता है कि अगर सुबह उठकर सिर्फ एक बार भी बारहों ज्योतिर्लिंगों का नाम ले लिया जाए तो सारा काम हो जाता है। सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग इस धरती का पहला ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा बड़ी विचित्र है। शिव पुराण की कथा के हिसाब से प्राचीन काल में राजा दक्ष ने अश्विनी समेत अपनी सत्ताईस कन्याओं की शादी चंद्रमा से की थी।

सत्ताईस कन्याओं का पति बन के चंद्रमा बेहद खुश हुए। कन्याएं भी चंद्रमा को वर के रूप में पाकर अति प्रसन्न थीं। लेकिन ये प्रसन्नता ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी। क्योंकि कुछ दिनों के बाद चंद्रमा उनमें से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए।

ये बात जब राजा दक्ष को पता चली तो वो चंद्रमा को समझाने गए। चंद्रमा ने उनकी बातें सुनीं, लेकिन कुछ दिनों के बाद फिर रोहिणी पर उनकी आसक्ति और तेज हो गई।

जब राजा दक्ष को ये बात फिर पता चली तो वो गुस्से में चंद्रमा के पास गए। उनसे कहा कि मैं तुमको पहले भी समझा चुका हूं। लेकिन लगता है तुम पर मेरी बात का असर नहीं होने वाला। इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम क्षय रोग के मरीज हो जाओ।

राजा दक्ष के इस श्राप के तुरंत बाद चंद्रमा क्षय रोग से ग्रस्त होकर धूमिल हो गए। उनकी रौशनी जाती रही। ये देखकर ऋषि मुनि बहुत परेशान हुए। इसके बाद सारे ऋषि मुनि और देवता इंद्र के साथ भगवान ब्रह्मा की शरण में गए।

फिर ब्रह्मा जी ने उन्हें एक उपाय बताया। उपाय के हिसाब से चंद्रमा को सोमनाथ के इसी जगह पर आना था। भगवान शिव का तप करना था और उसके बाद ब्रह्मा जी के हिसाब से भगवान शिव के प्रकट होने के बाद वो दक्ष के शाप से मुक्त हो सकते थे।

इस जगह पर चंद्रमा आए। भगवान वृषभध्वज का महामृत्युंजय मंत्र से पूजन किया। फिर छह महीने तक शिव की कठोर तपस्या करते रहे। चंद्रमा की कठोर तपस्या को देखकर भगवान शिव खुश हुए। उनके सामने आए और वर मांगने को कहा।

चंद्रमा ने वर मांगा कि हे भगवन अगर आप खुश हैं तो मुझे इस क्षय रोग से मुक्ति दीजिए और मेरे सारे अपराधों को क्षमा कर दीजिए।

भगवान शिव ने कहा कि तुम्हें जिसने शाप दिया है वो भी कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। लेकिन मैं तुम्हारे लिए कुछ करूंगा जरूर। इसके बाद भगवान शिव ने चंद्रमा के साथ जो किया उसे देखकर चंद्रमा न ज्यादा खुश हो सके और न ही उदास रह सके। लेकिन शिव ने ऐसा किया क्या।

चंद्रमा की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न थे। उन्हें वर देना चाहते थे लेकिन संकट देखिए। जिन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया है वो भी कोई साधारण हस्ती नहीं थे। असमंजस था ऐसा असमंजस जिसमें भगवान शिव भी पड़ गए थे।

खैर, शिव एक रास्ता निकालते हैं। चंद्रमा से कहते हैं कि मैं तुम्हारे लिए ये कर सकता हूं एक माह में जो दो पक्ष होते हैं, उसमें से एक पक्ष में तुम निखरते जाओगे। लेकिन दूसरे पक्ष में तुम क्षीण भी होओगे। ये पौराणिक राज है चंद्रमा के शुक्ल और कृष्ण पक्ष का जिसमें एक पक्ष में वो बढ़ते हैं और दूसरे में वो घटते जाते हैं। भगवान शिव के इस वर से भी चंद्रमा काफी खुश हो गए। उन्होंने भगवान शिव का आभार प्रकट किया उनकी स्तुति की।

यहां पर एक बड़ा अच्छा रहस्य है। अगर आप साकार और निराकर शिव का रहस्य जानते हैं तो आप इसे समझ जाएंगे, क्योंकि चंद्रमा की स्तुति के बाद इसी जगह पर भगवान शिव निराकार से साकार हो गए थे। और साकार होते ही देवताओं ने उन्हें यहां सोमेश्वर भगवान के रूप में मान लिया। यहां से भगवान शिव तीनों लोकों में सोमनाथ के नाम से विख्यात हुए।

जब शिव सोमनाथ के रूप में यहां स्थापित हो गए तो देवताओं ने उनकी तो पूजा की ही, चंद्रमा को भी नमस्कार किया। क्योंकि चंद्रमा की वजह से ही शिव का ये स्वरूप इस जगह पर मौजूद है।

समय गुजरा। इस जगह की पवित्रता बढ़ती गई। शिव पुराण में कथा है कि जब शिव सोमनाथ के रूप में यहां निवास करने लगे तो देवताओं ने यहां एक कुंड की स्थापना की। उस कुंड का नाम रखा गया सोमनाथ कुंड। कहते हैं कि कुंड में भगवान शिव और ब्रह्मा का साक्षात निवास है। इसलिए जो भी उस कुंड में स्नान करता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं। उसे हर तरह के रोगों से निजात मिल जाता है।

शिव पुराण में लिखा है कि असाध्य से असाध्य रोग भी कुंड में स्नान करने के बाद खत्म हो जाता है। लेकिन एक विधि है जिसको मानना पड़ता है। अगर कोई व्यक्ति क्षय रोग से ग्रसित है तो उसे उस कुंड में लगातार छह माह तक स्नान करना होगा। ये महिमा है सोमनाथ की।

शिव पुराण में ये भी लिखा है कि अगर किसी वजह से आप सोमनाथ के दर्शन नहीं कर पाते हैं तो सोमनाथ की उत्पति की कथा सुनकर भी आप वही पौराणिक लाभ उठा सकते हैं। इस तीर्थ पर और भी तमाम मुरादें हैं जिन्हें पूरा किया जा सकता है। क्योंकि ये तीर्थ बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे महत्वपूर्ण है।

धरती का सबसे पहला ज्योतिर्लिंग सौराष्ट्र में काठियावाड़ नाम की जगह पर स्थित है। इस मंदिर में जो सोमनाथ देव हैं उनकी पूजा पंचामृत से की जाती है। कहा जाता है कि जब चंद्रमा को शिव ने शाप मुक्त किया तो उन्होंने जिस विधि से साकार शिव की पूजा की थी, उसी विधि से आज भी सोमनाथ की पूजा होती है।

अगर आप शिवरात्रि की रात यहां महामृत्युंजय मंत्र का महज एक सौ आठ बार भी जाप कर देते हैं तो वो सारी चीजें आपको हासिल हो सकती जिसके लिए आप परेशान हैं।

ये है इस धरती के सबसे पहले ज्योतिर्लिंग की महिमा। शिव पुराण में ये कथा महर्षि सूरत जी ने दूसरे ऋषियों को सुनाई है। जो जातक इस कथा को ध्यान से सुनते हैं या फिर सुनाते हैं उनपर चंद्रमा और शिव दोनों की कृपा होती है। चंद्रमा शीतलता के वाहक हैं। उनके खुश होने से इंसान मानसिक तनाव से दूर होता है। और शिव इस जगत के सार हैं। उनके खुश होने से जीवन के सारे मकसद पूरे हो जाते हैं।

🌻“एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को गुस्से में भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया| उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा|
संत ने किसान से कहा , ” तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो , और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो” किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया|

तब संत ने कहा , ” अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ”

किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे| और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा| तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते|

हमें यह पता होना चाहिए कि हम क्या बोल रहे है, अन्यथा हमारे पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा|

अगर हमें गुस्सा आता है तो सबसे बेहतर यही होगा कि उस वक्त हम कुछ भी न बोलें क्योंकि उस वक्त हमारी वाणी को हम नहीं बल्कि हमारा क्रोध नियंत्रित करता है|”

एक संत थे। उनके कई शिष्य उनके आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। एक दिन एक महिला उनके पास रोती हुए आई और बोली, ‘बाबा, मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूं। मेरे रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। मैं बहुत अशांत और दु:खी हूं। कृपया मेरे मन को शांत करें।’

उसकी बात पर संत बोले, ‘हर किसी को पुश्तैनी जायदाद नहीं मिलती। अपना मकान बनाने के लिए आपको नेकी से धनोपार्जन करना होगा, तब आपका मकान बन जाएगा और आपको मानसिक शांति भी मिलेगी।’ महिला वहां से चली गई।

इसके बाद एक शिष्य संत से बोला, ‘बाबा, सुख तो समझ में आता है लेकिन दु:ख क्यों है? यह समझ में नहीं आता।’

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। इस बात का जवाब मैं तुम्हें नाव में बैठकर दूंगा।’ दोनों नाव में बैठ गए। संत ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। 

एक ही चप्पू से चलाने के कारण नाव गोल-गोल घूमने लगी तो शिष्य बोला, ‘बाबा, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘अरे तुम तो बहुत समझदार हो। यही तुम्हारे पहले सवाल का जवाब भी है। अगर जीवन में सुख ही सुख होगा तो जीवन नैया यूं ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी। 

जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुख भी होने चाहिए।

जब रात और दिन दोनों होंगे तभी तो दिन का महत्व पता चलेगा। जीवन और मृत्यु से ही जीवन के आनंद का सच्चा अनुभव होगा, वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।’ संत की बात शिष्य की समझ में आ गई।

एक गाँव में एक गरीब लड़का रहता था जिसका नाम मोहन था । मोहन बहुत मेहनती था लेकिन थोड़ा कम पढ़ा लिखा होने की वजह से उसे नौकरी नहीं मिल पा रही थी । 

ऐसे ही एक दिन भटकता भटकता एक लकड़ी के व्यापारी के पास पहुँचा । 

उस व्यापारी ने लड़के की दशा देखकर उसे जंगल से पेड़ कटाने का काम दिया ।

नयी नौकरी से मोहन बहुत उत्साहित था , वह जंगल गया और पहले ही दिन 18 पेड़ काट डाले। 

व्यापारी ने भी मोहन को शाबाशी दी , शाबाशी सुनकर मोहन और गदगद हो गया और अगले दिन और ज्यादा मेहनत से काम किया । लेकिन ये क्या ? वह केवल 15 पेड़ ही काट पाया । व्यापारी ने कहा – कोई बात नहीं मेहनत करते रहो ।

तीसरे दिन उसने और ज्यादा जोर लगाया लेकिन केवल 10 पेड़ ही ला सका । अब मोहन बड़ा दुखी हुआ लेकिन वह खुद नहीं समझ पा रहा था क्युकी वह रोज पहले से ज्यादा काम करता लेकिन पेड़ कम काट पाता । 

हारकर उसने व्यापारी से ही पूछा – मैं सारे दिन मेहनत से काम करता हूँ लेकिन फिर भी क्यों पेड़ों की संख्या कम होती जा रही है । व्यापारी ने पूछा – तुमने अपनी कुल्हाड़ी को धार कब लगायी थी ।

 मोहन बोला – धार ? मेरे पास तो धार लगाने का समय ही नहीं बचता मैं तो सारे दिन पेड़ कटाने में व्यस्त रहता हूँ। 

व्यापारी – बस इसीलिए तुम्हारी पेड़ों की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है।

कठिन परिश्रम के साथ साथ बुद्धिमानी और होशियारी  से किया गया कार्य ज्यादा अच्छा होता है.
🌻जो पूजे नित्य शिवजी का यह रूप, पावे सुख-सौभाग्य अनूप -- शिवपुराण से🌻

🌻देवाधिदेव शिवशंकर का अर्धनारीश्वर रूप, जो इस चराचर जगत् की उत्तपत्ति का कारण है, का आश्रय लेने से मनुष्य के सकल मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि इसने परमपिता ब्रम्हा की कामना को पूर्ण किया था। उनका भजन मंगलमय और सर्व सुख-सौभाग्य दाता मना जाता है।

शिवपुराण के अनुसार जब सृष्टिकर्ता ब्रम्हा द्वारा रची गयी सारी प्रजाएँ बिस्तार को प्राप्त नहीं हो रही थी, तब ब्रम्हाजी को बहुत दुःख और चिन्ता हुई। वे व्यग्र हो गए । उसी समय यों आकाशवाणी हुई, " ब्रह्मन् ! अब मैथुनी सृष्टि की रचना करो।" 

यह सुनने के बाद ब्रम्हा जी ने मैथुनी संसार रचने का प्रयास किया, किन्तु उनसे यह सम्भव नहीं हो सका। तब उन्होंने ध्यान लगाया। इससे उन्हें विचार आया कि यह कार्य बिना शिव कृपा से पूर्ण नहीं हो सकता। उन्होंने अविलम्ब भोलेनाथ की आराधना शुरू कर दी । 

उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर कष्टहारी शंकरजी कामदा मूर्ति में प्रविष्ट हो कर अर्धनारीश्वर रूपमें ब्रम्हाजी के सम्मुख प्रकट हो गए। ब्रम्हाजी ने शिवा समेत शिव को आये देख आनन्दित हो उन्हें साष्टांग दण्डवत् किया।

महेश्वर महादेव ने गम्भीर वाणी में कहा, " वत्स प्रजापति ! मैं  तुम्हारे तप से प्रशन्न होकर  तुम्हारे  मैथुनी सृष्टि निर्माण कार्य को सफल बनाऊँगा ।" फिर उन्होने अपने शारीर के अर्धभाग से शिवदेवी को अलग कर दिया। उस परमा शक्ति को देखकर ब्रम्हाजी ने तन्मयता से वन्दना की।

ब्रम्हाजी ने कहा, " मैं अपनी सृष्टि को बढ़ा नहीं पा रहा हूँ, अतः अब स्त्री- पुरुष के समागम से उतपन्न होनेवाली सन्तान के द्वारा इसको बढ़ाना चाहता हूँ। आप कृपाकर इसमें मेरी सहायता करें । इसके साथ ही आप मेरे सर्वसमर्थ पुत्र दक्ष की पुत्री के रूपमें अवतरित हो जाइए ।"

जगजननी महादेवी ने कहा, " तथास्तु- ऐसा ही  होगा ।"  फिर जगदम्बा ने अपनी भौहों के मध्य भाग से आपने ही समान एक शक्ति की रचना की । तदुपरांत शिवादेवी ब्रम्हाजी की मनोकामना पूर्ण कर शिवजी के शरीर में प्रविष्ट हो गयीं,ततपश्चात भोलेनाथ शक्ति समेत अन्तर्ध्यान हो गए। तभी से इस लोक में स्त्री-भाग की कल्पना हुई और मैथुनी सृष्टि चल पड़ी ।

अतः, जो भी मनुष्य इस अर्धनारीश्वर रूप की पूजा- अर्चना करेगा उसके परिवार में सुन्दर और भाग्यवान संतान होंगे और व्यक्ति की सकल कामनाएं मंगलमय ढंग से पूर्ण होंगी ।
 || जय हो भोलेनाथ ||  
 
🌻मन चंगा तो कठौती में गंगा, साधु के नाचने से गांव में कैसे हो गई बारिश : एक उपयोगी कथा🌻

🌻किसी गाँव मे एक साधु रहते थे. उनके बारे में विख्यात था कि वह जब भी नाचते  हैं तो उससे प्रसन्न होकर ईश्वर गांव में बारिश कर देते हैं.

गांव में जब भी बारिश की जरूरत होती, तो लोग साधु से अनुरोध करते कि वह नाचें. जब वह नाचने लगते तो बारिश ज़रूर होती.

बात गांव से बाहर जाकर बस गए कुछ बुद्धिजीवियों को पता चली. जब उन्हें यह साधु के नाचने से बारिश की बात पता चली तो वे माखौल उड़ाने लगे.

चार लोग गांव में आए. उन्होंने गाँव वालों को चुनौती दी- हम भी नाचेंगे तो बारिस होगी. यदि हमारे नाचने से बारिश नहीं हुई तो साधु के नाचने से भी नहीं होगी.

गांव वाले अगले दिन सुबह साधु की कुटिया पर पहुंचे और सारी बात कह सुनाई. मुकाबला शुरू हुआ. चारों मेहमानों ने नाचना शुरू किया. आधे घंटे बीते.

पहला व्यक्ति थक कर बैठ गया पर बादल नहीं दिखे. दूसरे ने नाचना शुरू किया. दो घंटे बीतते-बीतते चारों थक कर बैठ गए, पर बारिश नहीं हुई.

अब साधु की बारी थी, उसने नाचना शुरू किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई. साधु नाचता रहा. दो घंटा बीता बारिश नहीं हुई. पर साधु तो रुक ही नहीं रहे थे.

धीरे-धीरे शाम ढलने लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहट सुनाई दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी.

चारों दंग रह गए. उन्होंने साधु से क्षमा मांगी और पूछा-बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे नाचने से बारिश नहीं हुई पर आपके नाचने से हो गयी?

साधु ने उत्तर दिया– मैं इंद्र नहीं हूं न ही गांव वाले ऐसे लालची जो बिना वजह ईश्वर से पानी मांगें. इन लोगों के विश्वास से मुझे आत्मविश्वास मिलता है. इसलिए दो बातों का ध्यान में रखकर नाचता हूं.

पहली बात कि अगर मैं नाचूँगा तो बादलों को बरसना ही पड़ेगा और दूसरी यह कि मैं तब तक नाचूँगा जब तक बारिश न हो जाए.

ईश्वर मेरा निश्चय और मेरी नीयत देख रहे थे. मैं मुकाबला जीतने के लिए नहीं, गांव वालों का भरोसा कायम रखने के लिए नाच रहा था.

तुम भी इसी संकल्प और साफ मन से नाचते तो बादलों को स्वतः बरसना ही था.

हमें सफल लोगों की सफलता का चमकदार पहलू तो दिखाई देता है लेकिन उनके पैरों की बिवाइयां नहीं दिखतीं जो उन्होंने सफलता के लिए किए परिश्रम में पाई हैं.
किसी के उपहास उड़ाने से नहीं, हौसला बढ़ाने से उपयोगिता बढ़ाई जा सकती है जैसे किसान ने घड़े का मान बढ़ायाः प्रेरक कथा

एक किसान दो घड़ों को एक बड़ी सी लाठी के दोनों छोर पर बांधकर दूर एक नदी पर जाता और रोज वहां से पीने का पानी भर कर ले आता.

एक घड़ा कहीं से थोड़ा सा टूटा था जबकि दूसरा बिलकुल अच्छा. किसान दोनों घड़ों में पानी भरकर ले चलता लेकिन घर पहुंचते बस डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था. ऐसा कई सालों से चल रहा था.

जो घड़ा फूटा नहीं था उसे इस बात का घमंड था वह सर्वगुण संपन्न है. पूरा पानी घर तक पहुंचाता है. टूटे घड़े की समय-समय पर हंसी भी उड़ा देता था.

दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि उसके कारण किसान की मेहनत बेकार चली जाती है.

फूटा घड़ा यह सोचकर काफी दुखी रहने लगा. एक दिन उसने मन की बात किसान से कहने की सोच ली.

एक दिन किसान कंधे पर पानी लिए चला जा रहा था तभी आवाज आई- मैं खुद पर शर्मिंदा हूं. आपकी मेहनत बर्बाद करने के लिए माफी मांगता हूं.

किसान ने पूछा- तुम किस बात से शर्मिंदा हो? घड़े ने कहा- पिछले कई सालों से आप मुझे रोज लेकर नदी तक आते हैं. साफ करके पानी भरते हैं बदले में मैं बेईमानी कर लेता हूं.

मुझे जितना पानी आपके घर पहुंचाना चाहिए था उसका आधा ही पहुंचा पाया हूं. मेरे अन्दर कमी है जिससे आपकी मेहनत बर्वाद होती रही. घड़ा काफी दुखी था.

किसान घड़े की बात सुनकर बोला- कोई बात नहीं, मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को जरूर देखना. उसके बाद हम बात करेंगे.

नदी से घर के रास्ते पर घड़े ने वैसा ही किया. रास्तेभर सुन्दर फूलों को देखा तो उसकी उदासी कुछ दूर हुई लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते उसका आधा पानी गिर चुका था.

इस बात से उसकी खुशी गायब हो गई और वह मायूस होकर किसान से बार-बार क्षमा मांगने लगा.

किसान ने समझया- शायद तुम मेरा संकेत नहीं समझे. रास्ते में जितने फूल थे वे सब तुम्हारी तरफ ही थे. जिस घड़े से पानी नहीं गिरता उसकी तरफ एक भी फूल नहीं था.

मैं तुम्हारी कमी को जानता था लेकिन मैंने तुम्हें त्यागने की बजाय उसका लाभ उठाया. मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर फूलों के बीज बो दिए थे.

तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे. पूरे रास्ते को इतना सुंदर बना दिया. तुम्हारे कारण ही मैं भगवान को फूल अर्पित कर पाता हूं. तुमसे अपना घर सजाता हूं.

सारे रास्ते उन फूलों देखकर मुझे भार से होने वाली थकान नहीं लगती. सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते, तो क्या मैं यह सब कुछ कर पाता?

घड़े को अपने इस गुण का पता नहीं था. किसान ने जब उसे बताया कि उसके अवगुण में भी गुण हैं तो वह बहुत खुश हुआ.

किसी में कोई शारीरिक कमी दिखे तो उसका माखौल उड़ाने के बजाय उसे प्रेरित करें. आपकी एक कोशिश किसी का जीवन बदल सकती है.

वह इंसान घड़े की ही तरह स्वयं को बेकार समझकर नष्ट करने की बजाय वाला खुद पर गर्व करने लगेगा. यह भी एक तरह की प्रभु भक्ति है.
🌻दुनिया में कितना गम है, मेरा ग़म कितना कम है- ईश्वर को कोसने वाले एक परेशानहाल व्यक्ति को हुआ आत्मबोध🌻

🌻एक व्यक्ति अपनी परेशानियों से जूझ रहा था. उसे लगता कि वही संसार का सबसे दुखी व्यक्ति है.  

उसे प्रभु से इस बात की बड़ी शिकायत थी कि प्रभु ने संसार के सारे दुख उसके हिस्से दे दिए और फिर कान में तेल डालकर सो गए हैं. सोते-जागते प्रभु से प्रार्थना करता और फिर कोसता रहता. 

एक दिन उसने सोने से पहले प्रार्थना कि प्रभु यदि मेरे दुख मिटा नहीं सकते तो कम से ऐसे व्यक्ति के दुखों से तो बदल दो जो मेरे से कम दुखी हो तो मुझे कुछ राहत मिले. 

उस रात उसे सपने में भगवान दिखे. भगवान बोले- अपने कष्टों को विस्तार से कागज पर लिखो, एक गठरी बनाओ और शहर के मुख्य द्वार पर टांग आओ.

सुबह उसने भगवान के आदेश के मुताबिक गठरी बनाई और चौराहे पर पहुंचा. वहां उसने देखा कि पहले से ही लोगों लंबी कतार है जो दुखों की गठरी लिए पहुंचे हैं. आकाशवाणी हुई कि सभी अपनी गठरी अलग-अलग खूंटी में टांग दें.

वहां बेहिसाब खूंटिंया थी. सभी ने अपनी गठरी टांगी और ईश्वर के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे. फिर आकाशवाणी हुई. सभी अपने से हल्की गठरी अंदाजे से उठा लें. अब उन्हें वही दुख भोगने होंगे जो उनकी चुनी नई गठरी में दर्ज होंगे.

सबके साथ वह व्यक्ति भी नई गठरी चुनने भागा. काफी देर तक अंदाजा लगाता रहा. उसे डर था कि कहीं नई गठरी ऐसी न हो जिसमें पहले से भी ज्यादा दुख हों. 

वह कहीं किसी ऐसे व्यक्ति की गठरी न उठा ले जो उससे भी ज्यादा दुखी हो, जो उसे और तोड़ दें. फिर उसे लगने लगा कि कम से कम अपने दुखों से परिचित है उन्हें झेलने का आदी हो गया है. कहीं नए दुख ज्यादा पीड़ादायक न हो जाएं.

ऐसे विचारों में खोया वह एक के बाद एक गठरी के सामने से गुजरता लेकिन तय नहीं कर पाया कि कौन सी गठरी चुनी जाए. आखिरकार उसने अपनी गठरी ही उठा ली और चल पड़ा. उसने उनका पहले से ज्यादा मजबूती से सामने करने की ठान ली.

सच में सबको अपना दुख ज्यादा बड़ा और ज्यादा पीड़ादायक लगता है. बेहतर है कि हम यह सोचें- दुनिया में कितना गम है, मेरा ग़म कितना कम है.
🌻कर का मनका छाड़िके मन का मनका फेर- नारद की भक्ति का अभिमान तोड़ दिया भगवान ने🌻

🌻एक बार नारद मुनि ने श्रीहरि से पूछा कि आपका सबसे प्रिय भक्त कौन है? श्रीहरि समझ गए कि नारद को अपनी भक्ति का गुमान हो गया है. श्रीहरि बोले- मेरा सबसे प्रिय भक्त शिवपुर गांव का एक किसान है. नारद मुनि थोडे निराश हुए और प्रभु से पूछा- ऐसा क्या है जो वह आपका सर्वाधिक प्रिय भक्त है?

श्रीहरि ने नारद से कहा- आप एक दिन मेरे भक्त के साथ व्यतीत करें और फिर बताएं. नारद सुबह-सवेरे किसान के घर पहुंच गए. किसान जागा, सबसे पहले अपने जानवरों को चारा दिया. दैनिक कार्यो से निवृत होकर जल्दी-जल्दी भगवान का नाम लिया. कुछ खाकर खेतों पर चला गया और सारे दिन किसानी की. शाम को घर आया. जानवरों को चारा डाला. फ़िर थोडी देर भगवान का नाम लिया. परिवार के साथ भोजन किया और भगवान को प्रणाम कर सो गया.

नारद अचरज में थे. वह भगवान विष्णु के पास आए और बोले भगवन- मैं सारे दिन उस किसान के संग रहा. लेकिन वह तो विधिपूर्वक आपका नाम भी नहीं लेता. उसने तो बस थोडी देर सुबह, थोडी देर शाम को जल्दबाजी में आपका ध्यान किया. मैं तो चौबीस घंटे सिर्फ़ आपका ही नाम भजता हूं. फिर भी वही आपका सबसे प्रिय भगत क्यों है?  यह तो मेरे साथ अन्याय है.

श्रीहरि ने अमृत से भरा एक कलश नारद को दिया और कहा- इस कलश को लेकर तीनों लोको की परिक्रमा करके आइए, लेकिन ध्यान रहे अगर एक बूंद अमृत भी नीचे गिरा तो आपके सारे पुण्य नष्ट हो जाएंगे. नारद तीनों लोको की परिक्रमा कर प्रभु के पास लौटे और बताया कि एक बूंद भी अमृत नहीं छलकने दिया. प्रभु ने पूछा- इस दौरान आपने मेरा स्मरण कितनी बार किया? नारद बोले, मेरा सारा ध्यान अमृतकलश पर था इसलिए आपका ध्यान नहीं कर पाया.

भगवान विष्णु बोले- हे नारद! उस किसान को देखो जो अपना कर्म करते हुए भी नियमत रुप से मेरा स्मरण करता है. जो अपना कर्म करते हुए भी मेरा जप करे वही मेरा सब से प्रिय भक्त है. आप तो खाली बैठे ही जप करते हो. जब आपको कार्य दिया तो मेरे स्मरण की सुध नहीं रही. नारद सब समझ गए. भगवान के चरण पकडकर क्षमा मांगी.

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे कोय।।

🙏एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या  है?

🙏सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो। वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया. लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.

सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

लड़के ने उत्तर दिया,”सांस लेना”

सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना  चाहते थे  तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है.
एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा..

तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी..

इस घोषणा को सुनकर सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा..

कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे, कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा..

कल्पना कीजिये कैसा
अद्भुत दृश्य होगा वह !!

उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े..

सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे..

राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था..

उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी..

राजा उस लड़की को देखकर सोच में पढ़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है..

वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया..

राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी..
.
.
जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की..

ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हर रोज मौका देता है और हम हर रोज गलती करते है..

हम ईश्वर को पाने की बजाएँ
ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं
की कामना करते है और
उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है

पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी..

ईश्वर को चाहना और
ईश्वर से चाहना..
दोनों में बहुत अंतर है

लालसा कष्ट का कारण बनती है, परोपकार के बदले उपकार के भाव से अभिमान आता है

एक आदमी को जीवन से बड़ी ख्वाहिशें थीं. उसने उन्हें पूरी करने की कोशिश भी की लेकिन सफल नहीं रहा. किसी सत्संगी के संपर्क में आकर उसे वैराग्य हुआ और संत हो गया. संत होने से उसे किसी चीज की लालसा ही न रही. 

संत भगवान की भक्ति में लगे रहते. योग, साधना और यज्ञ-हवन करते. इससे उसे मानसिक सुख मिलता और उसमें दैवीय गुण भी आने लगे. एक बार वह ईश्वर की लंबी साधना में बैठे. 

इससे देवता प्रसन्न होकर उनके पास आए और वरदान मांगने को कहा. संत ने कहा- जब मेरे मन में इच्छाएं थीं तब तो कुछ मिला ही नहीं. अब कुछ नहीं चाहिए तो आप सब कुछ देने को तैयार है. आप प्रसन्न हैं यही काफी है. मुझे कुछ नहीं चाहिए.

देवता ने कहा- इच्छा पर विजय प्राप्त करने से ही आप महान हुए. भगवान और आपके बीच की एक ही बाधा थी, आपकी अनंत इच्छाएं. उस बाधा को खत्मकर आप पवित्र हुए. मुझे भगवान ने भेजा है. इसलिए आप कुछ न कुछ स्वीकार कर हमारा मान रखें.

संत ने बहुत सोच-विचारकर कहा- मुझे वह शक्ति दीजिए कि यदि मैं किसी बीमार व्यक्ति को स्पर्श कर दूं तो वह भला-चंगा हो जाए. किसी सूखे वृझ को छू दूं तो उसमें जान आ जाए. देवता ने वह वरदान दे दिया. 

संत ने रूककर कहा- मैं अपने वरदान में संशोधन चाहता हूं. बीमार व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ और वृक्ष को जीवन मेरे छूने से नहीं मेरी छाया पड़ने से ही हो जाए और मुझे इसका पता भी न चलें. 

देवता ने पूछा- किसी को स्पर्श करने में कोई शंका है? संत ने कहा- बिल्कुल नहीं परंतु मैं नहीं चाहता कि यह बात फैले कि मेरे स्पर्श से लोगों को लाभ होता है. 

शक्ति का अहसास मन को मलिन करके कुच्रकों की रचना शुरू करता है चाहे वह कोई दैवीय सिद्धि ही हो क्यों न हो. उसे श्रेष्ठता का अभिमान होने लगता है. फिर तो यह वरदान मेरे लिए शाप बन जाएगा. अच्छा है कि लोगों का कल्याण चुपचाप हो जाए. 

जब आपकी किसी चीज के लिए बहुत ज्यादा इच्छा होती है तब वह वस्तु आसानी से नहीं मिलती. लालसा घटते ही वह सरलता से उपलब्ध होने लगती है. बहुत ज्यादा इच्छाएं मानसिक अशांति का कारण बनती हैं. 

🙏परोपकार का भाव रखना बहुत अच्छा है लेकिन उस परोपकार के बदले उपकार का भाव रखना लालसा है. लालसा आते ही परोपकार का आपका सामर्थ्य कम होता है. 
जिस भक्ति में विनम्रता नहीं वह भक्ति नहीं भ्रम है, यमराज ने एक साधु को दिया डाकू की सेवा का दंड

एक साधु निर्जन स्थान पर आश्रम बनाकर रहते थे. उनके आश्रम में भक्तिभजन प्रवचन आदि चलते रहते थे. वहां पर भक्तों की आवाजाही लगी रहती थी. 

साधु अपने अनुयायियों को ईश्वर में श्रद्धा रखने और बुराइयों से दूर रहने की सीख देते थे. उनके वचनों में एक आकर्षण था. भक्त भाव विभोर होकर उनके प्रवचन सुना करते थे. 

आश्रम के पास एक जंगल में एक डाकू रहता था. उससे लोग बहुत डरते थे. उसकी एक खास बात यह थी कि वह सिर्फ अमीरों से धन लूटता था लेकिन गरीबों को कभी नहीं सताता था.

अजीब संयोग यह हुआ कि साधु और डाकू की मृत्यु एक ही दिन और एक ही समय पर हुई. मरने के बाद दोनों यमराज के दरबार में पहुंचे. वहां उन के कर्मों का बही खाता खुला. 

बही-खाता देखने के बाद यमराज ने कहा- अब तुम्हारी किस्मत का फैसला होने वाला है. तुम्हें अपने बारे में कुछ विशेष कहना है तो कह सकते हो. 

साधु बोला- मैंने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया. मैं हमेशा भक्ति में लीन रहा हूं और दूसरों को भी भक्ति की राह पर चलने की सीख दी है. मैंने लोक में अच्छे कार्य किए. 

जो लोक में अच्छे कार्य करते हैं उनका परलोक सुधरता है. इसलिए ऐसे में लगता है कि मुझे स्वर्ग मिलना चाहिए. और मेरे सुख-सुविधाओं का पूरा ख्याल होना चाहिए. 

यमराज ने डाकू से पूछा- तुम्हें भी कुछ कहना है? डाकू बोला- प्रभु, मैंने तो जीवनभर लूटपाट की है. अब मैं किसी अच्छे परिणाम की अपेक्षा तो रख नहीं सकता. मेरे कर्मों का जो भी दंड हो, वह मुझे दें. 

यमराज ने कहा- हम तुम्हारे दंड का विधान बाद में करेंगे. फिलहाल तुम रोज इस साधु की सेवा किया करो. डाकू तो यमराज की आज्ञा मान तुरंत साधु की सेवा के लिए तैयार हो गया, किंतु साधु डाकू से सेवा लेने को तैयार नहीं था.

साधु ने यमराज से कहा- महाराज, यह कैसा आदेश है? मैं तो इस पापी के स्पर्श से भ्रष्ट हो जाऊंगा. मैंने 

यमराज कुपित हो गए- दूसरों को जीवनभर लूटने वाला डाकू तो विनम्रतापूर्वक तुम्हारी सेवा करने के लिए तैयार है, पर घमंडी साधु, तुम वर्षों की साधना के बाद भी समझ न सके कि हरेक प्राणी के अंदर एक ही आत्मा समाई है. 

यमराज बोले- दूसरे को भक्ति का मार्ग दिखाने वाले साधु तुम्हारी भक्ति अधूरी है. तुम्हारे मन का मैल धोना बहुत जरूरी है. इसलिए आज से रोज तुम इस डाकू की सेवा करोगे. 

साधु निरुत्तर रह गया. उसे समझ में आ गया कि उसकी भक्ति में खोट था. उसने दंड स्वीकार किया और डाकू की सेवा में जुटा.

अपनी भक्ति और अपने सत्कर्मों पर कभी भी अभिमान न करें. विनम्रता और शालीनता की अहमियत किसी भक्ति से कम नहीं. प्रभु भी सरल मन प्राणियों पर अपनी ज्यादा कृपा करते हैं.
जीवन में अपनो की अहमियत !

1. माँ से बढकर कोई महान नही है।
2. पिता से बढकर कोई मार्गदर्शक नही है।
3. गुरु से बढकर कोई ग्यानी नही है।
4.भाई से बढकर कोई भरोसेमंद नही है।
5. बहन से बढकर कोई रिश्ता नही है।
6. पत्नि से बढकर कोई जीवन साथी नही है।
7. पुत्र से बढकर कोई सहारा नही है।
8. पुत्री से बढकर कोई सेवा करने वाला नही है।
9. मित्रता से बढकर कोई प्रेम नही है।
जीवन में नफरतों में क्या रखा है।
मोहब्बत से जीना सीखो, 
क्यूंकि यारों 
ये दुनिया न तो मेरा घर है,
और न ही आपका ठिकाना।
ना मैं यहाँ पर्मनेंट रहूँगा 
और ना ही आप। 
ईसीलिए भले ही अपने उसूल हमेशा खुद से ऊपर रखना,
पर रिश्तो में जरा झुकने का जिगर रखना।
कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए अचानक एक दुसरे के सामने आ गए विचलित से कृष्ण प्रसन्नचित सी राधा...
कृष्ण सकपकाए, 
राधा मुस्काई 
इससे पहले कृष्ण कुछ कहते 
राधा बोल💬 उठी-
"कैसे हो द्वारकाधीश ??"
जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया
फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया
और बोले राधा से ...
"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!
आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ 
कुछ तुम अपनी कहो
सच कहूँ राधा 
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."
बोली राधा - 
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते
इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे
प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?
कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?
कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?
एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया और दसों उँगलियों पर चलने वाळी बांसुरी को भूल गए ?
कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ? 
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी
कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?
कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं
कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता
आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो
पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?
सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है
आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?
क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे
आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे 
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे
आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है
मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं
गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है, 
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है ।
🌻अतिथि सत्कार का सुखः संकट में फंसे कबूतर परिवार ने प्राण देकर एक हिंसक बहेलिए का जीवन सुधारा- महाभारत की नीति कथा🌻

🌻जंगल में एक बहेलिया शिकार कर रहा था. बहेलिया होने के कारण पशुओं से दया दिखाने का तो सवाल ही नहीं था, मनुष्यों के प्रति भी उसका स्वभाव क्रूर था.

उसने कई जानवर मारे, कुछ को पिंजड़े में बंद कर लिया. शिकार करके शाम को वह घर लौट रहा था कि ओले पड़ने लगे. सर्दियों के दिन थे.

भीगने के कारण उसकी बुरी दशा हो गई. उस पर बेहोशी चढ़ रही थी. बहेलिया भटकने लगा.

उसे हर ओर तूफान के कारण धरती पर गिरे पक्षियों के घोंसले और मृत बच्चे दिखाई दे रहे थे. बहेलिया एक घने पेड़ के नीचे रूका.

वहां उसे जमीन पर पड़ी एक कबूतरी दिखी जो सर्दी से कांप रही थी. वह खुद कष्ट में था लेकिन लालच ऐसा कि उसने कबूतरी को पिंजड़े में डाल लिया.

उसने रात उसी पेड़ के नीचे बिताने का तय किया. पत्ते बिछाए और पत्थर पर सिर रखकर लेट गया. उस पेड़ पर एक कबूतर अपने परिवार के साथ रहता था.

कबूतरी नहीं लौटी तो कबूतर को चिंता हुई. उसे तरह-तरह की आशंका हो रही थी कि कहीं तूफान में उसे कुछ हो तो नहीं गया.

दुखी कबूतर बिलखता हुआ कह रहा था- ऐसी उत्तम पत्नी के बिना जीवन का कोई मोल नहीं. सौभाग्य से ऐसी जीवनसंगिनी मिली थी. उसके बिना सब सूना लगा रहा है.

पिंजड़े में कैद कबूतरी सुनकर प्रसन्न हुई कि उसने एक कुशल पत्नी का धर्म निभाया है और उसका परिवार उससे प्रसन्न है.

उसने कबूतर से कहा- यह बहेलिया आज हमारा अतिथि है. सर्दी से अचेत हो रहा है. आतिथ्य धर्म निभाते हुए आग का प्रबंध करिए. मेरे लिए दुख न करें. आपको दूसरी पत्नी मिल जाएगी.

धर्म के अनकूल पत्नी की बातें सुनकर कबूतर खुश हुआ. लोहार के पास से एक जलती लकड़ी चोंच में लाया और सूखे पत्तों पर डाल दिया. आग जली तो बहेलिए की जान बची.

बहेलिए ने कहा- अतिथि के लिए भोजन का भी प्रबंध करो. कबूतर ने कहा- हम कभी अन्न संग्रह तो नहीं करते फिर भी तुम्हारी भूख मिटाने को कुछ करता हूं.

कबूतर ने अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा की और फिर उसमें कूद गया. कबूतर का त्याग देखकर बहेलिए को पछतावा हुआ- एक पक्षी होकर इसमें दूसरों के प्राणों पर इतनी दया है?

उसने सभी जीवों को पिंजड़े से मुक्त कर दिया. कबूतरी से क्षमा मांगी और वचन दिया कि क्रूर कर्म त्याग देगा. पति के त्याग से एक मानव में हुए इस परिवर्तन से कबूतरी गर्व कर रही थी.

कबूतरी विलाप करने लगी. मेरे पति के समान वचनपालक कोई दूसरा नहीं हो सकता. धर्मपालन के लिए उसने जीवन त्याग दिया. मेरे प्राणों का क्या मोल. कबूतरी ने भी प्राण त्याग दिए.

अतिथि सेवा महान धर्म है. अनीति का सहारा लेने वाले अतिथि के प्रति भी कर्तव्य नहीं भूलना चाहिए. क्या पता उस दिन ईश्वर स्वयं उस अतिथि में समाकर आपकी परीक्षा ले रहे हों |
- (महाभारत की नीति कथा)

Contact Form

Name

Email *

Message *

Blog Archive

Translate Language

Popular Posts

click on